यादें

वक़्त की कब्र में सोईं हुई कुछ यादें हैं,

आह से रंगे हुए ख्वाबों की चादर में सिमटी रहती हैं जो|

धुंध के पर्दों के पीछे से झाँका करती हैं जो

कुछ यादें ऐसी भी हैं|

कुछ नींद में मिलती हैं मुझसे

कुछ आँखें चुराया करती हैं|

कुछ यादें ऐसी भी हैं जो हंसती हैं मुझ पर,

कई आंसू का कतरा बन कर गालों को चूमा करती हैं|

कुछ बेबस आँखों से देखती हैं मुझको,

काँधे पर सर रख कर सिसकती भी हैं|

क्यों रूठी हुई यादों में मिलते हो तुम?

क्या सब यादों का हिस्सा हो तुम?

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One response to “यादें

  1. Nice touching poem.

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